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Monday, 17 April 2017

पूरी दुनिया जानती है पाकिस्तान आतंकवादी राष्ट्र: नकवी


केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी अपने तीन दिवसीय दौरे पर रामपुर आए हुए हैं। बुधवार की सुबह शहर से करीब दस किलोमीटर दूर शंकरपुर स्थित उनके आवास पर उनसे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न मुद्दों पर बात की, जिसका बड़ी बेवाकी से उन्होंने जवाब दिया। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के संपादित अंश...।
 सवाल:पाकिस्तान आए दिन सीमा पर हमला होते हैं और हम अमेरिका की ओर मुंह ताकते हैं कि अमेरिका पाक को आतंकी राष्ट्र घोषित करे। हम संसद में खुद उसे क्यों नहीं आतंकी राष्ट्र घोषित करते?
जवाब: बिना घोषित किए ही पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवादी देश है। यही वजह है कि आज वह अलग-थलग पड़ गया है। पड़ोसी मुल्क बंग्लादेश और आफगानिस्तान भी उससे दूरी बनाए हैं।

सवाल: यह कैसे कह सकते हैं कि पड़ोसी देशों ने पाकिस्तान से दूरी बना ली है?
जवाब: आपने देखा होगा, सर्जिकल स्ट्राइक जब हुआ तब कोई भी देश उसकी हिमायत में नहीं आया। यह इस बात का सबूत है कि इस्लामिक कंट्री हों या यूरोपियन देश, सभी में पाकिस्तान की छवि अच्छी नहीं है।

सवाल: अभी कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों के साथ अभद्रता का वीडियो वायरल हुआ, इस पर क्या कहेंगे?
जवाब: कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश हो या फिर इस तरह की घटनाएं। सभी का मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान ने न कभी मोदी सरकार ने समझौता किया है और न ही करेंगे।

सवाल: बलूचिस्तान के सीएम का अभी दो दिन पहले बयान आया था कि हम पाकिस्तान के साथ भाई-भाई की तरह रहे हैं और रहेंगे, भारत की मदद नहीं चाहिए।
जवाब: दरअसल, बलूचिस्तान की सरकार पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली है। दुनिया को बलूच के सीएम नहीं बल्कि, वहां की अवाम क्या चाहती है, उसे देखना होगा। पाक अधिकृत कश्मीर में जनता त्रस्त है और उसे आतंकी अपने लिए सबसे अधिक सेफ जोन समझते हैं।

सवाल: तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर चीन हमें आंखें दिखा रहा है, इस पर क्या कहेंगे?
जवाब: अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। वहां के बारे में हमें चीन या किसी अन्य देश से कोई सर्टीफिकेट की जरूरत नहीं है।

सवाल: ईवीएम को लेकर विभिन्न राजनैतिक दल चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं?
जवाब: ये सब नकारात्मक सोच वाली पार्टियों के लोग ही कर रहे हैं और बाल की खाल निकाल रहे हैं। जबकि,  ऐसा करने वालों को सोचना चाहिए कि यह जनादेश का अपमान है।

सवाल: तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण को बढ़ाने की बात कही गई है, क्या यह सही है?
जवाब: धर्म के नाम पर आरक्षण की इजाजत संविधान भी नहीं देता। आरक्षण जातिगत आधार पर नहीं बल्कि, उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए। हमारी सरकार गरीब, पिछड़ों, अति पिछड़ों के लिए काम कर रही है। बिना तुष्टिकरण के आखिरी व्यक्ति तक विकास पहुंचे, इस सोच पर काम हो रहा है। यही वजह है कि न सिर्फ भारत बल्कि, पूरी दुनिया में मोदी जी गरीबों के सच्चे हितैषी के रूप में उभर रहे हैं। जनता का भरोसा सरकार पर दिनोंदिन बढ़ रहा है।
 

Wednesday, 1 March 2017

फिल्म इंडस्ट्री में अभी तो शुरुआत है, विश्व पटल पर छाएगा मेरा रामपुर

रामपुर शहर की गलियों में बचपन गुजारने वाले अभिनेता रजा मुराद की हिंदी सिनेमा जगत की हिट फिल्म 'नमक हराम' पहली फिल्म रही। इसके बाद 'बिंदिया और बंदूक' आयी। फिर एक के बाद एक फिल्में आती रहीं। प्रेमरोग, राम तेरी गंगा मैली, खुद्दार, राम-लखन, त्रिदेव, प्यार का मंदिर, आंखें, मोहरा, गुप्त समेत करीब तीन सौ फिल्मों में अभिनय किया। बालीवुड के अलावा भोजपुरी सिनेमा, पंजाबी के अलावा कई अन्य भाषायी फिल्में भी इन्होंने की। वह बड़े गर्व से कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में अभी तो शुरुआत है, विश्व पटल पर छाएगा मेरा रामपुर....!

वह कहते हैं कि यह मेरा शहर है, मेरा रामपुर है। यहां की मिट्टी की सौंधी सी खुशबू अभी भी मेरी सांसों में समाई हुई है। यहां की फिजा में घुली है उर्दू की मिठास और हिंदी का प्यार। गंगा-जमुनी तहजीब के इस मरकज ने अब तरक्की की राह पर चलना शुरू कर दिया है। सड़कों का चौड़ीकरण हो रहा है, ओवर ब्रिज बन रहे हैं, शिक्षा के संस्थान भी खुल रहे हैं और तकनीकी शिक्षा की ओर शहर के युवाओं का रुझान तेजी से बढ़ा है। ये तो शुरुआत है, बदलाव की यह हवा और तेजी पकड़ेगी, फिर मेरा रामपुर विश्व पटल पर छा जाएगा। यह उम्मीद भी है एक सपना भी।
शहर के बीचोबीच, हाथीखाना के पास एक मुहल्ला है जीना इनायत खां। यहीं से हुई मेरे जीवन की शुरुआत। मेरे वालिद हामिद खां उर्फ मुराद साहब यहां नगर पालिका में ईओ थे। रामपुर की एक खास बात है। यहां के लोग मुहब्बत में कोई भी नाम दे देते हैं। मेरे वालिद लंबे-चौड़े थे, खूबसूरत थे, उनकी आंखें कुंजी थीं। लिहाजा, शहर के लोगों ने उन्हें हामिद बिल्ला का ऐसा नाम दिया, जो आज भी मशहूर है। रामपुर की तंग गलियों से मुम्बई तक का सफर भले ही मैंने तय किया। लेकिन, आज भी मेरी सांसों में मेरा शहर बसा हुआ है। रामपुर की गंगा-जमुनी तहजीब मेरी जिंदगी में इस तरह समाई है कि कभी उससे दूर नहीं हुआ। उर्दू के अल्फाजों में वो पैनापन, जिसने बॉलीवुड में मुझे अलग पहचान दिलाई, ये मेरे शहर की ही देन है। यहां से मुम्बई गए करीब पचास साल हो गए। इस लंबे वक्त में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा होगा, जब अपने शहर की मुझे याद न आयी हो। यह शहर से लगाव ही है कि जब-जब मौका मिलता है, मैं अपने शहर जरूर आता हूं। वह कहते हैं कि बीते कुछ समय से शहर तरकी की राह पर है। उम्मीद ही नहीं भरोसा है कि शुरुआत में भले ही विकास की यह रफ्तार धीमी है लेकिन, वक्त के साथ साथ तरक्की की गति भी बढ़ रही है। रामपुर में प्रतिभाएं बहुत हैं पर, उन्हें तलाशने और फिर तराशने की जरूरत है।
 
 

रुपहले पर्दा और पर्दे के पीछे भी रामपुर की छाप
रुपहला पर्दा हो या फिर पर्दे के पीदे रामपुर की छाप रही है। यहां के बाल कलकार अजान से लेकर यूथ एक्ट्रेस रुख्सार तक अपनी कला पर्दे पर दिखा रही हैं। वहीं निर्माता निर्देशक शाहिद वहीद खां हों या फिर फिलहाल में ही रिलीज हुई फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन के डायरेक्टर अली अब्बास जफर, दोनों ने ही पर्दे के पीछे रहकर अपने हुनर को दर्शकों के लिए परोसा है।

शाहिद वहीद खां
निर्माता-निर्देशक, मयूर फिल्मस
(अब तक 45 सीरियल में निर्देशन। खाली हाथ, रिश्ते, यादगार सीरियल। )
अपने शहर से शायर, कलाकार, कवि तरह-तरह की प्रतिभाआें ने रामपुर का नाम रोशन किया है। शहर तरक्की की राह पर है। शिक्षा का स्तर उठा है, स्वास्थ्य सेवाएं पहले से बेहतर हुई हैं। लेकिन, शहर और भी तरक्की कर सकता है। इसकी अच्छी संभावनाएं हैं। यहां उच्च शिक्षा और प्रोफेशनल कोर्स के संस्थान खोले जाएं। कलाकार को मंच मिले, इसका प्रयास किया जाना चाहिए। यहां छोटे-छोटे सभागार और विवाह मंडप हैं, एक भव्य हाल की आवश्यकता है, जहां थियेटर हो सके। थियेटर से ही कला निखरती है। यह रामपुर के लिए बहुत जरूरी है।

रुखसारसिने कलाकार
अपने शहर की रुखसार भी सनम बेवफा फिल्म से बालीवुड में धाक जमाने के बाद अब टेलीविजन चैनलों पर धूम मचा रही है। वह कई धारावाहिकों में काम कर चुकी है। आजकल सोनी चैनल पर कुछ तो लोग कहेंगे, में अपनी कला का जौहर दिखा रही है।

ये होना चाहिए-तकनीकी शिक्षा के खोले जाएं संस्थान
-आर्ट एवं कल्चर के लिए मिले बढ़ावा
-हिंदी, उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा को दिया जाए बढ़ावा
-हाईटेक युग में इंग्लिश स्पीकिंग के खुलें संस्थान
 

कुंद हुई रामपुरी चाकू की धार....अब कुछ और भी हैं इस शहर की पहचान

किसी जमाने में चाकू की धार के लिए मशहूर रामपुर को अब एक नई धार मिल गई है। देश में रामपुरी चाकू के बाद अब आरी की धार चल रही है। पंजाब के बाद रामपुर में सबसे ज्यादा आरी का निर्माण हो रहा है। वहीं गार्डन टूल्स और कन्नी के कारोबार ने भी देश में रामपुर को एक नई पहचान दी है। मौजूदा समय में आरी, गार्डन टूल्स और कन्नी की सप्लाई देश में नागालैंड, मेघालय, कर्नाटक, कलकत्ता, असम, बंगलौर, दिल्ली, उत्तराखंड और बिहार में हो रही है। छोटी रकम से शुरू हुआ यह कारोबारा मौजूदा समय में सालाना दस करोड़ के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। वहीं हार्डवेयर के क्षेत्र में अभी भी अपार संभावनाएं रामपुर में छुपी हुई हैं।

 
बॉलीवुड में थी रामपुरी चाकू की धाक
साठ और सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मों के खलनायक रामपुरी चाकू पर अक्सर इतराते देखे गए। लेकिन, धीरे-धीरे रामपुरी चाकू की धार कुंद होती चली गई। अब हालत ये है कि चाकू के कारोबार से जुड़े लोग चायना चाकू और दूसरे कारोबार से जुड़ने लगे हैं।
आरी,कन्नी और गार्डन टूल्स के मेन मेन सप्लायर मशकूर मियां बताते हैं कि अठारहवीं सदी के दौरान जब आग उगलने वाले हथियारों का चलन हुआ तब रामपुर के नवाब फैजुल्ला खां ने अपनी सेना के लिए छोटे हथियारों के रूप में चाकू का इस्तेमाल करना शुरू किया था। भारत के दूसरे स्टेट के नवाब और राजाआें ने भी रामपुरी चाकू को अपनी शान के रूप में रखा। रामपुर के बेमिसाल पिस्तौलनुमा चाकू की छाप अंग्रेजों तक पर पड़ी। सन् 1949 में जब रामपुर स्टेट का आजाद भारत में विलय हुआ तक चाकू के व्यवसाय में सबसे ज्यादा उछाल आया। रामपुर में ही चाकू बेचने की बाध्यता समाप्त हो गई, कारोबारी दूसरे शहरों में भी रामपुरी चाकू बेचने लगे। जिससे चाकू उद्योग कभी बुलंदियों पर था। आलम यह था कि रामपुर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से उतरते ही लोगों में बटनधारी चाकू को दखेने की हसरत नजर आती थी। बाजार में तीन इंच से लेकर पंद्रह इंच तक के एक तरफा धार, दो तरफा धार और बटन से खुलने वाले चाकू बहुत मशहूर थे। लेकिन, 1990 में राज्य सरकार ने चार इंच से ज्यादा लंबे ब्लेड के चाकू पर प्रतिबंध लगा दिया। तब से यह कारोबार मंदा होता चला गया। पुरानी तहसील पर कभी पचास से ज्यादा दुकानें हुआ करती थीं। दो हजार से अधिक कारीगर जुटे रहते थे। आज महज तीन दुकानें ही बची हंै। ये लोग भी चायना चाकू, कैंची व अन्य वस्तुएं बेचकर कारोबार कर रहे हैं।
हालांकि वक्त के साथ रामपुरी चाकू की धार भी कुंद पड़ती चली गई। कारोबार मंदा होने पर इस धंधे से जुड़े हुनरमंदों ने दूसरे व्यवसाय की ओर रुख करना शुरू कर दिया। बेरोजगारी बढ़ी तो लोगों ने आरी, कन्नी और गार्डनटूल्स का कारोबार शुरू कर दिया। स्थानीय हुनरमंदों ने रामपुरी चाकू की धार की जगह आरी की धार को तेज कर दिया। लघु उद्योग के रूप में शुरू हुआ यह कारोबार धीरे-धीरे रामपुर की पहचान बनने लगा। वहीं कन्नी और गार्डन टूल्स ने भी देश में रामपुर को एक नई पहचान दी।

यहां आज भी हैं कारखाने
मुहल्ला पुरानागंज, दुमहला रोड, नालापार, मदरसा कोना, पक्का बाग, जेल रोड, शुतरखाना, मोचियों वाली गली, मंगल की पैठ और मियां का बाग और बिलासपुर गेट में लगे हैं कारखाने।


फैक्ट फाइल-
-18वीं सदीं में नवाब फैजुल्ला खां के जमाने से हुई रामपुरी चाकू की शुरुआत
-1949 में स्टेट विलय के बाद पूरे भारत में फैल गया रामपुरी चाकू का कारोबार
-करीब दो हजार कारीगरों के हुनर से चमकी चाकू की धार
-पुरानी तहसील पर बनी मुख्य बाजार, 50 बड़े कारोबारियों ने फैलाया कारोबार
-1990 में राज्य सरकार ने चार इंच से लंबे चाकू पर लगाया प्रतिबंध
-अब कुंद हुई धार तो कारीगर और दुकानदारों ने ढूंढ लिया दूसरा कारोबार
-जिले में अब आरी, कन्नी और गार्डन टूल्स के छोटे-बड़े करीब 75 कारखानें चल रहे हैं।
-1600 हुनरमंदों को मिल रहा है रोजगार
-नागालैंड, मेघालय, कर्नाटक, कलकत्ता, असम, बंगलौर, मद्रास, दिल्ली, उत्तराखंड और बिहार में हो रही है सप्लाई।
-सप्लाई औसतन रोजाना 1100 आरी और 3000 कन्नी।
-सभी कारोबारियों का मिलाकर सालाना दस करोड़ रूपए तक पहुंचा टर्नओवर


फैक्ट फाइल-

Tuesday, 28 February 2017

रामपुरी वायलिन से गूंज रहे ‘मुहब्बत’ के तराने

वायलिन...नाम सुनते ही फिल्म मोहब्बतें का वह दृश्य सामने आ जाता है, जिसमें शाहरुख खान वायलिन बजा रहे होते हैं। जी हां, ये वायलिन अपने शहर में न सिर्फ बनते हैं बल्कि, देश और विदेशों की आवोहवा में संगीत की धुन घोलते हैं। ये कारोबार आज रामपुर शहर के कारखानों से निकलकर दूसरे देशों तक जा पहुंचा है। लेकिन, बात यहीं नहीं थमती। जिस तरह युवाओं पर वायलिन का जादू चढ़ा है, उससे इस कारोबार में और भी संभावनाएं हैं। देश ही नहीं विदेश तक धूम मचा रहे रामपुरी वायलिन के कारोबार से जुड़ी पेश है खास रिपोर्ट...!

 


ऐसे तैयार होता है वायलनि
एनजीएम म्युजिकल कंपनी के स्वामी ग्यासुद्दीन बताते हैं कि कश्मीर और हिमाचल से फर्र की लकड़ी, कोलकाता से गज बो, तार, खूंटी, प्ले पीस, फिंगर बोर्ड, एंड पिन और साउंड के लिए जर्मनी की मयपिलवुड से हम लोग  वायलिन तैयार कराते हैं। देश-विदेश में रामपुरी वायलिन के नाम से मशहूर इस कारोबार से शहर में करीब 250 लोग जुड़े हैं। लगभग दो सौ परिवारों की रोजी-रोजी का जरिया बने इस कारोबार को हमारी म्यूजिकल कंपनी समेत शहर की चार मुख्य म्यूजिकल कंपनियां बढ़ावा दे रही हैं। हालांकि, सरकार इसे विदेशी वाद्य यंत्र मानती है, इसलिए टैक्स के दायरे में रखा है। फिर भी यह कारोबार देश के प्रमुख शहरों के रास्तों से होता हुआ पड़ोसी मुल्कों में भी अपनी पहचान बनाए हुए है। टैक्स फ्री कराने के लिए कानूनी जंग लड़ी जा रही है। कमिश्नरी में वाद चल रहा है। सरकारी सहूलियतें मिलीं, टैक्स फ्री हुआ तो कारोबार में और भी उछाल आ जाएगा। फिल्मों में वायलिन दिखाए जाने से युवाओं का शौक वायलिन की ओर बढ़ा है। सो संभावनाएं अच्छी हैं।

सत्तर साल पुराना है इतिहास
रामपुरी वायलिन का इतिहास करीब सत्तर साल पुराना है। संगीत और काष्ठशिल्प के शौकीन अमीरुद्दीन और हसीनुद्दीन दोनों सगे भाइयों का हुनर रामपुर में वायलिन का जनक बना। दरअसल, अमीरुद्दीन एक बार बाजार गए, वहां जापान का बना हुआ वायलिन उन्हें पसंद आया। उन्होंने फुटपाथ पर लगे फड़ से इसे खरीद लिया और यहां अपने घर ले आए। एक दिन मचान से कोई सामान उतारते वक्त वायलिन नीचे गिरा और टूट गया, जिस पर उन्हें बड़ा दुख हुआ। उन्होंने काष्ठशिल्प में माहिर अपने भाई हसीनुद्दीन से कहा कि किसी भी तरह वह वायलिन बना दें। बस यहीं से रामपुरी वायलिन की शुरुआत हो गई।

मुहब्बते फिल्म ने जगाई ललक
वायलिन कारोबार करीब 13-14 साल पहले मुहब्बतें फिल्म की रिलीजिंग से उछला। इस फिल्म में शाहरुख खान को वायलिन बजाते हुए दिखाया गया है। तब से युवाआें में वायलिन सीखने की दिलचस्पी पैदा हो गई। इसके चलते यहां के वायलिन की मांग तेजी से बढ़ती गई। आज भी वायलिन वाद्य यंत्रों के शौकीन युवाआें में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

चाइनीज वायलिन से है मुकाबला
रामपुरी वायलिन का मुकाबला चाइनीज वायलिन से है। फिलवक्त में कम कीमत के बावजूद चायना मार्केट को यहां का वायलिन टक्कर दे रहा है। कारोबारी मोहम्मद जफर के मुताबिक पंद्रह-सोलह सौ रुपये में चाइनीज वायलिन आ जाता है जबकि, रामपुरी वायलिन की कीमत ज्यादा है। फिर भी यहां का वायलिन अधिक पसंद किया जाता है। शुरुआती दौर में करीब चार-पांच साला पहले चायना वायलिन ने टक्कर दी थी लेकिन, मौजूदा वक्त में रामपुरी वायलिन की डिमांड ज्यादा है।

यहां बनते हैं रामपुरी वायलिनसल्वाकिया म्यूजिकल्स, रामपुर
रागाज म्यूजिकल्स, रामपुर
धुन म्यूजिकल, कंपनी, रामपुर
एनजीएम म्यूजिकल्स, कंपनी, रामपुर

कोलकाता समेत कई शहरों से आता है कच्चा माल
रामपुरी वायलिन बनता भले ही अपने शहर में है। लेकिन, इसके लिए कच्चा माल कोलकाता समेत दूसरे कई शहरों से आता है। साउंड के लिए जो लकड़ी इस्तेमाल होती है, वह जर्मन की है। जो दिल्ली और गाजियाबाद से मंगवायी जाती है। इसके अलावा गज बो, तार, खूंटी, फिंगरबोर्ड, एंडपिन आदि कोलकाता से मंगवायी जाती हैं। जबकि, फर्र की लकड़ी हिमाचल और कश्मीर से खरीदी जाती है।

यहां-यहां होती है सप्लाई
कोलकाता, दिल्ली, तमिलनाडु और पंजाब। जबकि कोलकाता, तमिलनाडू, दिल्ली से श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ्रीका को एक्सपोर्ट होता है।

हुनर बना रोजी का जरिया
हाथों का हुनर कभी बेकार नहीं जाता। जी हां, वायलिन बनाने वाले कारीगर भी यही मानते हैं। उनकी रोजी-रोटी का जरिया उनका हुनर बना हुआ है। शेप सेटिंग करने वाले कारीगर मोहम्मद फूल कुरैशी कहते हैं कि आधा घंटा में एक वायलिन की शेप तैयार कर देते हैं। 1500-2500 रुपये माहवार कमा लेते हैं। नेक तैयार करने वाले अजीज अहमद 25 साल से अपना हुनर दिखा रहे हैं। वह कहते हैं कि कारीगरी ही उनके परिवार की आय का स्रोत है।

फैक्ट फाइल-
-जिले में वायलिन कारीगर करीब 200
-कच्चा माल लाने-ले जाने के कमीशन एजेंट करीब 10
-शहर में वायलिन निर्माता कंपनियां चार
-मुख्य वायलिन कारोबारी 10-15
-कोलकाता, कश्मीर, हिमाचल से रॉ मेटेरियल
-ट्रांपैरेंट थिनर कलरफुल वायलिन की डिमांड ज्यादा
-एक वायलिन 900-1200 में बनकर तैयार
-मार्केट में कंपलीट वायलिन सेट की कीमत 2000-2500 रुपये
-देश में कोलकाता, पंजाब, तमिलनाडू और दिल्ली सप्लाई
-श्रीलंका, अफ्रीका, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक कारोबार

रामपुर रजा लाइब्रेरी, यानी बेशकीमती पांडुलिपियों का खजाना



बदलते जमाने के साथ हाईटेक हुई रजा लाइब्रेरी
एशिया की दूसरे नंबर की लाइब्रेरी रजा लाइब्रेरी ने भी बदलते जमाने के साथ अपना कलेवर बदला है। बेशकीमती पाण्डुलिपियां अब आन लाइन होंगी। पाण्डुलिपियों को संरक्षित किया जा रहा है। फारसी में लिखी रामायण का हिन्दी में अनुवाद हो चुका है। नवाब हामिद अली खां ने 1905 में किला में इस लाइब्रेरी की शुरुआत की। आजादी के बाद नवाब रजा अली खां ने कुतुब खाना सरकारी से बेशकीमती किताबों और पाण्डुलिपियों को हामिद मंजिल में महफूज किया था।

लाइब्रेरी की धरोहर
उर्दू, हिंदी, फारसी, अरबी, संस्कृत, पश्तो और टर्की की किताबें हैं। पांडुलिपियां हैं।

यहां से आते हैं शोधार्थी
सऊदी अरब, लंदन, जर्मन, फ्रांस, अमेरिका, जापान, इटली, ईरान, यमन, कोलंबिया और अफ्रीका से।

फारसी में लिखी रामायण का हिंदी अनुवाद
फारसी में लिखी रामायण का अब हिन्दी में अनुवाद हो चुका है। सुंदर नक्काशी के साथ इस सचित्र हिंदी रामायण का विमोचन 2011 में हुआ। रामायण का फारसी से हिन्दी अनुवाद पूर्व विशेष कार्याधिकारी स्वर्गीय डा0 वकारूल हसन सिद्दीकी और पूर्व विशेष कार्याधिकारी प्रोफेसर शाह अब्दुस्सलाम ने किया था। यह रामायण वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रचित थी। इससे पहले इसका अनुवाद सुमेर चन्द्र ने फारसी जुबान में किया था। इसमें खास बात यह है कि रामायण का आगाज बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीमसे किया गया है।

भोजपत्र पर लिखी रामायण, मौला अली के हाथ का लिखा कुरान हैं बेशकीमती
रजा लाइब्रेरी के खजाने में भोजपत्र पर तेलगू व मलयालम में लिखी रामायण और सातवीं सदी में ऊंटकी खाल पर हजरत अली के हाथ से लिखा कुरान शरीफ बेशकीमती हैं। यहां आने वालों के लिए मुख्य आकर्षण हैं। इसके अलावा आठवीं सदी में जाफरो सादिक अलैहिस्सलाम के हाथ से लिखा कुरान मजीद, नवीं सदी में इमाम रजा के हाथ से लिखा कुरान और दसवीं सदी में इब्ने मुकला के हाथ से लिखा कुरान भी दर्शनीय है।

लाइब्रेरी पर हुआ डाक टिकट जारी
रामपुर। 19 जून 2011 को इस लाइब्रेरीकी ख्याति को डाक टिकट जारी होने पर एक और बुलन्दी मिली। भारत सरकार संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय डाक विभाग द्वारा रजा लाइब्रेरी स्मारक डाक टिकट का विमोचन 19 जून 2009 को महामहिम टी0वी0 राजेश्वर राज्यपाल उ0प्र0 ने राजभवन लखनऊ में किया था। इस मौके पर पूर्व विशेष कार्यधिकारी प्रो0 शाह अब्दुस्सलामऔर चीफ पोस्ट मास्टर जनरल उ0प्र0 नीलम श्रीवास्तव मौजूद थे।

पाण्डुलिपियों का संरक्षणदीमक या बारिश से भीगकर खराब हो चुकी किताबों को दुरुस्त करने के लिए रसायनों का प्रयोग करने का रास्ता अख्तियार किया गया है।

रजा लाइब्रेरीकी व्यवस्था देखता है बोर्ड
रजा लाइब्रेरी की तमाम व्यवस्था पर लाइब्रेरी बोर्ड की नजर रहती है। कोई भी कार्य करने से पहले बोर्डकी मंजूरी जरूरी होती है। लाइब्रेरी की तमाम व्यवस्था बोर्ड की निगरानी में रहती है। वर्तमान में बोर्ड के चेयरमैन राज्यपाल राम नाईक,राज्यपाल उत्तर प्रदेश  हैं। जबकि, बोर्ड में आठ नामित सदस्य हैं।

यह है खास-
-इंडो-यूरोप वास्तुकला का अदभुत नमूना है रजा लाइब्रेरी।
-फ्रांसीसी इंजीनियर मिस्टर डब्ल्यू0सी0राइट ने बनाया था इस इमारत का नक्शा।
-प्रत्येक माह अमेरिका, लंदन, सऊदी अरब,जापान, इटली, ईरान,यमन, कोलंबिया, अफ्रीका आदि मुल्कों से आते पन्द्रह से बीस शोधार्थी।
-मध्यकालीन पेंटिग का इतिहास जानने की रहती है ललक।

रामपुर की शराब से सजते हैं विदेशी मयखाने

विपिन कुमार शर्मा, रामपुर। भारत की बात छोड़िए, लंदन हो या हॉंगकांग, स्विटजरलैंड हो या अमेरिका..., यूरोप से लेकर गल्फ कंट्रीज तक रामपुर की शराब का सुरूर मयकशों के सिर चढ़कर बोलता है। विदेशी मयखाने रामपुर की शराब से सजाए जाते हैं। जिनकी बदौलत ढाई हजार करोड़ रुपये सालाना कंपनी का टर्नओवर है।
रेडिको खेतान की यूनिट रामपुर डिस्टलरी देश-विदेश में रामपुर का नाम रोशन कर रही है। कंपनी करीब पांच हजार लोगों को रोजगार मुहैया करा रही है। इसमें कमोवेश हर साल ही कुछ न कुछ आधुनिकीकरण पर काम होता रहता है। नतीजा यह है कि रामपुर और देश के दूसरे शहरों में डिस्टलरी के तीस बाटलिंग यूनिट हैं। देशी-विदेशी शराब के चालीस ब्रांड यहां तैयार किए जाते हैं। जो यूरोप, अफ्रीकन और गल्फ कंट्रीज के चालीस देशों में एक्सपोर्ट किए जाते हैं। कंपनी के कुछ ब्रांडों को क्वालिटी मेंटेंन करने में गोल्ड मैडल तक मिल चुका है। बीते दो सालों में कंपनी का टर्न ओवर में उछाल आया है। जिससे फिलवक्त में एक हजार करोड़ का राजस्व रेडिको द्वारा जमा किया जाता है। कंपनी की प्लानिंग है कि इस बार भी प्राफिट के अनुसार क्वालिटी मेंटेन और क्वांटिनी बढ़ाने में बड़ा निवेश किया जाएगा।


ये है रामपुर डिस्टलरी का इतिहास
वर्ष 1943 में जब रामपुर में नवाबी रियासत थी। तब रामपुर स्टेट में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश कंपनी ने डिस्टलरी की स्थापना की थी। देश आजाद हुआ, रामपुर स्टेट का स्वतंत्र भारत में विलय हुआ। तब ब्रिटिश कंपनी ने इसे डालमिया ग्रुप को सेल कर दिया। उस वक्त सीमित संसाधन, उपकरणों का अभाव या मार्केट में बेहतर तालमेल का अभाव, वजह जो भी रही, डालमिया ग्रुप ने वर्ष 1975 में रेडिको खेतान ग्रुप को रामपुर डिस्टलरी बेच दी। तब से रेडिको के नाम से डिस्टलरी देशी और विदेशी शराब बना रही है। एल्कोहल के एक के एक बेहतरीन उत्पाद देश-विदेश में बेचे जा रहे हैं।

मैजिक मोमेंट मार्फिस को मिला गोल्ड मैडल
रामपुर डिस्टलरी में तैयार की गई मैजिक मोमेंट मार्फिस को क्वालिटी सेटिस्फकेशन पर गोल्ड मैडल मिल चुका है। यही अवार्ड दूसरे प्राडक्ट कांटेसा रम को भी मिल चुका है। कंटेसा की सप्लाई मिलिट्री के लिए भी की जाती है। कंपनी का मोटो क्वालिटी बेस प्राडक्टस मार्केट में लाना है। इस पर रिसर्च भी होती रहती है।


चालीस देशों तक फैला कारोबार
रेडिको खेतान यानी रामपुर डिस्टलरी का कारोबार विदेशों तक फैला हुआ है। एशिया, यूरोप, अफ्रकन और गल्फ कंट्रीज में यहां के प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किए जाते हैं। रेडिको खेतान के डायरेक्टर आपरेशन केपी सिंह बताते हैं कि दुुनिया के चालीस देशों में यहां के ब्रांड एक्सपोर्ट किए जाते हैं।
पांच हजार करोड़ का टर्नओवर
रामपुर डिस्टलरी का टर्नओवर ढाई हजार करोड़ रुपयों का है। केपी सिंह बताते हैं कि कंपनी के देशी और विदेशी शराब के चालीस ब्रांड हैं। जिन्हें अपने देश के अलावा दूसरे देशों में भी बेचा जाता है। इससे सभी तरह का एक हजार करोड़ रुपये कर के रूप में राजस्व को जाता है। जबकि, कंपनी का वार्षिक टर्नओवर पांच हजार करोड़ रुपये है।


देशी शराब के ब्रांड
मस्तीह
विंडीज
झूम प्ले
मिस जलवा

विदेशी शराब के प्रमुख ब्रांड
मैजिक मोमेंट वोदका
वोदक इन ऑरेंज फ्लेवर
वोदका इन एपिल फ्लेवर
वोदका इन लैमन फ्लेवर
वोदका इन चोको
वोदका रसभरी
वोदका लैमन ग्रास जिंजर
8पीएम ह्विस्की
आफ्टर डार्क ह्विस्की
कांटेसा रम
मार्फिस बरांडी
रायल व्हाइट हॉल
क्राउन ह्विस्की


भारतीयों को मस्ती तो विदेशियों को लुभाती है वोदकाबेशक रामपुर डिस्टलरी के देशी और विदेशी करीब चालीस ब्रांड हैं। लेकिन, कुछ ब्रांड ही ऐसे हैं जिनकी मार्केट में अच्छी पकड़ है। कंपनी लोकल स्तर पर मस्ती की सप्लाई करती है। यहां देशी शराब पीने वालों को मस्ती का सुरूर चढ़ता है। लेकिन, विदेशों में वोदका की डिमांड ज्यादा है। यही वजह है कि विदेशियों की पसंद को ध्यान में रखते हुए वोदका को छह अलग-अलग फ्लेवर में तैयार किया जाता है।

एक नजर में
1943 में ब्रिटिश कंपनी द्वारा स्थापित
आजादी के बाद डालमिया ग्रुप को सेल
1975 में रेडिको खेतान ने खरीदा
रामपुर और देश के दूसरे शहरों में 30 बाटलिंग यूनिट
क्वालिटी बेस एल्कोहल एक्सपोर्टर
देशी-विदेशी शराब के चालीस ब्रांड निर्माता
यूरोप, अफ्रीकन, गल्फ कंट्रीज समेत 40 देशों में एक्सपोर्ट
करीब पांच हजार लोगों को रोजगार
पांच हजार करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर
एक हजार करोड़ रुपये राजस्व को लाभ

Sunday, 26 February 2017

रामपुर हाउंड: इसमें है चीते जैसी फुर्ती


रामपुर हाउंड, एक ऐसा नाम जिसने छोटे से जनपद रामपुर को विश्व पटल पर लाने में अहम भूमिका निभाई है। चीते जैसी फुर्ती वाला यह स्पेशल डॉग शिकार के शौकीनों की पहली पसंद बना हुआ है। डॉग रेस हो या फिर हंटिंग दोनों में अपना लोहा मनवा चुका रामपुर हाउंड की स्थिति यह है कि हजारों से शुरू हुई इसकी कीमत अब लाखों तक पहुंच चुकी है। बकायदा लंदन से यह ब्रीड पेटेंट है। ब्रिटिश हुकूमत में रामपुरी हाउंड सम्मान पा चुका है।

ऐसे तैयार हुई नस्ल
रामपुर हाउंड की यह संकर प्रजाति कई उच्च प्रजातियों के मिश्रण का परिणाम है। बंटी केनन (केसीआई रजिस्टर्ड) बताते हैं कि इसमें तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, इंग्लैंड एवं देशी नस्ल कुत्ता की नस्ल मिश्रित है। इसे इसका लुक इसकी ताजी एवं अफगान नस्ल से मिला है। जबकि, रफ्तार इसे इसकी अंग्रेजी ग्रे-हाउंड से मिली है। अपने शिकार का पीछा करने में इसका कोई जवाब नहीं। जंगली सुअर जैसे खूंखार जानवरों का शिकार करने में इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। गंभीर रूप से घायल हो जाने पर भी यह उसे नहीं छोड़ता। दरअसल रामपुर हाउंड को सुबह के शिकार के उद्देश्य से ब्रीड किया गया। यह चीते जैसी फुर्ती से अपने शिकार को गर्दन से पकड़ता है और उसे धराशायी कर देता है। हार्स रेस की तरह डॉग रेस भी होती है। शिकार के लिए भी इस्तेमाल होता है। लिहाजा, चीते की तरह तेजी से दौड़ सके और आसानी से अपने शिकार को दबोच सके। ऐसी दोनो खूबियों में माहिर है रामपुर हाउंड। यही वजह है कि न सिर्फ भारत बल्कि, पड़ोसी मुल्कों में भी रामपुर हाउंड की खासी डिमांड है। यहां यह ब्रीड तैयार तो होती है, डॉग ऊंची कीमत में बेचे भी जाते हैं।


ये है रामपुर हाउंड का इतिहास
रामपुर स्टेट के चौथे नवाब अहमद अली खान बहादुर ने एक ऐसी प्रजाति के विषय में विचार किया जो उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप हो। चूंकि, रामपुर उस समय चारो ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ था। जिनमें तमाम तरह के खूंखार जंगली जानवरों का वास था, शिकार के उद्देश्य से ऐसी सहयोगी की दरकार थी जो किसीभी प्रकार के जंगली जानवरों से डटकर मुकाबला कर सके और उसे धराशायी करने में पूरी तरह सक्षम हो। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए 1794-1840 के मध्य ग्रे हाउंड से अफगान हाउंड और फिर ताजी हाउंड का क्रास कराने के बाद रामपुर हाउंड ईजाद हुआ। 1923 में साइरस नाम के रामपुर हाउंड ने शिकार में झंडे गाड़े। भारत में कुत्तों की दो ही स्पेशल ब्रीड तैयार की गईं जिसमें दक्षिण भारत की राज पलायन और रामपुर की रामपुर हाउंड शामिल है।


क्या है केसीआई
केनल क्लब आफ इंडिया को शार्ट फार्म में केसीआई कहते हैं। डॉग रेस या डॉग से जुड़े अन्य कंपटीशन में शामिल होने के लिए केसीआई से रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। यहां से कुत्ते का बाकायदा नाम और सर्टीफिकेट जारी होते हैं। मूलत: ये लंदन की कंपनी का क्लब है, जिसका इंडिया में आफिस चेन्नई में है।


ये हैं केसीआई रजिस्टर्ड
-बंटी केनल
-आमिर केनल
 
 
यहां है रामपुर हाउंड की डिमांड
भारत में लखनऊ, बनारस, दक्षिण भारत के अलावा विदेश में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब आदि में खासी डिमांड है। यहां लोग गिफ्ट में भी रामपुर हाउंड दे देते हैं। भारत में 20-25 हजार रुपये से लेकर डेढ़-दो लाख रुपये तक रामपुर हाउंड की कीमत है।
 
 
अंग्रेजों ने सम्मानित किया था रामपुर हाउंड
सन 1857 के गदर से पूर्व अंग्रेजी शासन काल में कलकत्ता में हुई प्रदर्शनी में रामपुर स्टेट की बेमिसाल वस्तुओं के साथ ही रामपुर हाउंड को भी शामिल किया गया था। तब वहां अंग्रेजों ने रेस कराई थी, जिसमें रामपुर हाउंड विजेता रहा था। इस पर सम्मानित किया गया था।
 
 
क्या है खूबी
-लंबाई करीब डेढ़ फुट से लेकर सवा दो फुट तक होती है।
-लंबी टांगे और सीना पतला होता है।
-कान पीछे की ओर मुड़े होते हैं।
-इसके पंजों की पकड़ मजबूत होती है और नाखून शिकार के लिए खूंखार होते हैं।
-23 से 28 इंच तक ऊंचा होता है।
-इसका भार करीब 38-40 किलोग्राम तक होता है।
-इसकी मादा सवा फुट से लेकर दो फुट तक हो सकती है।
-मादा का भार 35-38 किलोग्राम तक होता है।
-चीते की तरह तेज दौड़ता है।
-शिकार को पकड़ने में माहिर है।
-इसकी रफ्तार करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है।